सदी के दूसरे सिंहस्थ का द्वितीय शाही स्नान 9 मई को – astrologysupport.com


महाकाल की नगरी उज्जैन में सदी के दूसरे महाकुंभ में द्वितीय शाही स्नान अक्षय तृतीया 9 मई को होगा। इसमें  करीब 15 लाख से ज्यादा श्रद्धालु मोक्ष दायिनी शिप्रा में आस्था और विश्वास की डुबकियां लगाएंगे। शाही स्नान प्रात: 4 बजे से शैव अखाड़ों के नागा सन्यासियों के स्नान से प्रारंभ होगा। 

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दत्त अखाड़ा घाट एवं रामघाट पर शाही स्नान में सुबह 4 बजे से 12.40 बजे तक निर्धारित क्रमानुसार विभिन्न अखाड़ों के साधु, संत स्नान करेंगे। रविवार को उज्जैन आने वाले कई रास्तों पर लंबा जाम भी देखा गया। इंदौर से हजारों लोगों का उज्जैन पहुंचने का सिलसिला लगातार जारी है।
स्थानीय प्रशासन द्वारा शाही स्नान के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं एवं प्रबंध सुनिश्चित कर लिए गए हैं।  एडीजी मधु कुमार ने कहा कि स्नान के दौरान अखाड़ों के आगे-पीछे, दाएं और बाएं  घाटों पर पर्याप्त संख्या में पुलिस और पैरामिलेट्री बल के जवान तैनात रहेंगे। भीड़ प्रबंधन और यातायात व्यवस्था भी सुनियोजित होगी।
मधु कुमार के अनुसार शाही स्नान के लिए जुलूस मार्ग की धुलाई, चूने की लाइनिंग, मार्ग पर पानी का छिड़काव एवं घाटों पर स्नान के लिए पहुँचे साधु-संतों का परम्परागत तरीके से स्वागत एवं सत्कार किया जाएगा। शाही स्नान के लिए सभी अखाड़ों के स्नान-क्रम और घाटों पर आने-जाने के लिए मार्ग निर्धारित किए गए हैं।
शैव अखाड़े के स्नान के लिए क्रम एवं समय निर्धारित
श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा : यह अखाड़ा स्नान के लिए भूखी माता स्थित छावनी से जुलूस के रूप में प्रात: 3.20 रवाना होकर 4 बजे दत्त अखाड़ा घाट पर पहुँचेगा। स्नान के बाद प्रात: 5 बजे घाट खाली कर प्रात: 5.45 बजे पुन: अपनी छावनी पहुँचेगा।
जूना अखाड़ा के साथ हनुमान गढ़ी के पास से आवाहन एवं अग्नि अखाड़े बड़नगर रोड होते हुए भूखी माता मार्ग पर जूना अखाड़े के जुलूस में शामिल होकर स्नान के लिए प्रात: 4 बजे दत्त अखाड़ा पर पहुँचेंगे और स्नान कर प्रात: 5 बजे घाट खाली करेंगे। स्नान के बाद ये अखाड़े दत्त अखाडा से वापस भूखी माता मार्ग होते हुए बड़नगर मार्ग से वापस अपने कैम्प में पहुँचेंगे।
श्री तपोनिधि निरंजनी अखाड़ा एवं श्री पंचायती आनंद अखाड़ा : श्री निरंजनी अखाड़ा एवं पंचायती आनंद अखाड़ा बड़नगर रोड स्थित अपनी छावनी से निकलकर शंकराचार्य चौक से छोटी रपट, दत्त अखाड़ा घाट पहुँचकर प्रात: 5 बजे स्नान करेंगे और प्रात: 6 बजे घाट खाली कर प्रात: 6.45 बजे पुन: उसी मार्ग से अपनी छावनी में पहुँचेंगे।
श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा एवं पंच अटल अखाड़ा : श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा एवं पंच अटल अखाड़ा बड़नगर रोड छावनी से शंकराचार्य चौक होते हुए छोटी रपट, केदारघाट एवं दत्त अखाड़ा घाट पर पहुँचकर प्रात: 6 बजे स्नान करेंगे और प्रात: 7 बजे घाट खाली कर 7.45 बजे पुन: इसी मार्ग से अपनी छावनी में पहुँचेंगे। वैष्णव अखाड़ों का स्नान क्रम, समय एवं मार्ग
श्री निर्वाणी अणि अखाड़ा : यह अखाड़ा मंगलनाथ केम्प से खाक चौक, कंठाल,गोपाल मंदिर, गुदरी चौक, रामानुज कोट होते हुए प्रात: 7 बजे रामघाट पहुंचेगा। स्नान के बाद प्रात: 8 बजे घाट खाली कर प्रात: 9.30 बजे पुन: अपनी छावनी में पहुँचेंगे।
श्री दिगम्बर अणि अखाड़ा : श्री दिगम्बर अणि अखाड़ा मंगलनाथ छावनी से खाक चौक, कंठाल, गोपाल मंदिर, गुदरी चौक, रामानुज कोट होते हुए प्रात: 8 बजे रामघाट पहुँचेगा। स्नान के बाद प्रात: 9 बजे घाट खाली कर प्रात: 10.30 बजे पुन: अपनी छावनी में पहुँचेंगे।
श्री निर्मोही अणि अखाड़ा : श्री निर्मोही अणि अखाड़ा मंगलनाथ छावनी से खाक चौक, कंठाल,गोपाल मंदिर, गुदरी चौक, रामानुज कोट होते हुए प्रात: 9 बजे रामघाट पहुँचेगा। स्नान के बाद प्रात: 10 बजे घाट खाली कर प्रात: 11.30 बजे पुन: अपनी छावनी में पहुँचेगा।
उदासीन एवं निर्मल अखाड़े का स्नान क्रम समय एवं मार्ग निर्धारित : श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा छोटी रपट, दानी गेट, मोढ़ की धर्मशाला, गणगौर दरवाजा, बड़ा उदासीन अखाड़े के सामने से बम्बई धर्मशाला होते हुए प्रात: 10.30 बजे रामघाट पहुँच कर स्नान करेगा और 11.30 बजे घाट खाली कर इसी रास्ते से वापस अपने अखाड़े में पहुँचेगा।
श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा : यह अखाड़ा बड़नगर स्थित छावनी से शंकराचार्य चौराहा, छोटी रपट होते हुए रामघाट 10.30 बजे पहुँचेगा और स्नान कर 11.30 बजे घाट खाली कर पुन: इसी मार्ग से वापस 12.30 बजे अपनी छावनी जाएगा।
श्री निर्मल अखाड़ा बड़नगर रोड : यह अखाड़ा बड़नगर स्थित छावनी से रवाना होकर छोटी रपट पर नए  उदासीन अखाड़े के जुलूस के वापस निकल जाने के बाद 11.10 बजे वहाँ से रवाना होकर 11.40 बजे रामघाट पहुँचकर स्नान करेगा। इसी मार्ग से वापसी करते हुए दोपहर 1.30 बजे पुन: छावनी पहुँचेगा।
सभी महामण्डलेश्वर एवं खालसे जुलूस में शामिल अपने-अपने अखाड़ों के साथ ही स्नान करेंगे। अलग से कोई भी स्नान नहीं करेंगे। वाहन चालक अपने वाहन पर ही रहेंगे ताकि स्नान करने के बाद महामण्डलेश्वर एवं अन्य संत शीघ्रता से रवाना हो सके। अखाड़े में जो वाहन शामिल होंगे उन्हें अलग से पास जारी किया जाएगा। अनाधिकृत वाहन जुलूस में शामिल नहीं हो सकेंगे।
जुलूस में शामिल होने वाले सभी साधु-संतगण एवं भक्तों को कोई गमछा या परिचय-पत्र अखाड़े द्वारा प्रदाय किया जाएगा, जिससे सुनिश्चित हो सके कि जुलूस में संबंधित अखाड़े के साधु-संत और भक्त ही शामिल है। अखाड़ों के लिए निर्धारित समय में रामघाट व दत्त अखाड़ा घाट पर आम श्रद्धालुओं का स्नान के लिए प्रवेश प्रतिबंधित रहेगा। अखाड़ों के स्नान के बाद ही आम श्रद्धालु इन घाटों पर स्नान के लिए पहुंच सकेंगे।
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वेदों के अनुसार  सिंहस्थ महाकुंभ का महत्व
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वैदिक जीवन पद्धति कुंभ जैसे आयोजनों का आदर्श रही है। देश को सांस्कृतिक एकसूत्रता में बांधने के लिए चारों कोनों में पीठों की स्थापना करने वाले आदिशंकराचार्य भी वैदिक जीवन के ही प्रचारक थे, इसलिए यह जानना दिलचस्प होगा कि कुंभ जैसे आयोजनों के बारें में वेदों में क्या कहा गया है। वैदिक स्थापनाओं से यह तो स्पष्ट है कि ऐसे आयोजन तब भी होते थे और बाद में आदिशंकराचार्य ने फिर से इस परम्परा को आगे बढ़ाया। वैदिक संस्कृति में जहां व्यक्ति की साधना, आराधना और जीवन पद्धति को परिष्कृत करने पर जोर दिया है, वहीं पवित्र तीर्थस्थलों और उनमें घटित होने वाले पर्वों व महापर्वों के प्रति आदर, श्रद्धा और भक्ति का पावन भाव प्रतिष्ठित करना भी प्रमुख रहा है। विश्व प्रसिद्ध सिंहस्थ महाकुंभ एक धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महापर्व है, जहां आकर व्यक्ति को आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की अनुभूति होती है। सिंहस्थ महाकुंभ महापर्व पर देश और विदेश के भी साधु-महात्माओं, सिद्ध-साधकों और संतों का आगमन होता है। इनके सानिध्य में आकर लोग अपने लौकिक जीवन की समस्याओं का समाधान खोजते हैं। इसके साथ ही अपने जीवन को ऊध्र्वगामी बनाकर मुक्ति की कामना भी करता है। मुक्ति को अर्थ ही बंनधमुक्त होना है और मोह का समाप्त होना ही बंधनमुक्त होना अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों में मोक्ष ही अंतिम मंजिल है। ऐसे महापर्वों में ऋषिमुनि अपनी साधना छोड़कर जनकल्याण के लिए एकत्रित होते हैं। वे अपने अनुभव और अनुसंधान से प्राप्त परिणामों से जिज्ञासाओं को सहज ही लाभान्वित कर देते हैं। इस सारी पृष्ठभूमि का आशय यह है कि कुंभ-सिंहस्थ महाकुंभ जैसे आयोजन चाहे स्वरस्फूर्त ही हों, लेकिन वह उच्च आध्यात्मिक चिन्तन का परिणाम है और उसका सुविचारित ध्येय भी है। ऋग्वेद में कहा गया है –

जधानवृतं स्वधितिर्वनेव स्वरोज पुरो अरदन्न सिन्धून्।
विभेद गिरी नव वभिन्न कुम्भभा गा इन्द्रो अकृणुत स्वयुग्भिः।।

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कुंभ पर्व में जाने वाला मनुष्य स्वयं दान-होमादि सत्कर्मों के फलस्वरूप अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है जैसे कुठार वन को काट देता है। जैसे गंगा अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है, उसी प्रकार कुंभ पर्व मनुष्य के पूर्व संचित कर्मों से प्राप्त शारीरिक पापों को नष्ट करता है और नूतन (कच्चे) घड़े की तरह बादल को नष्ट-भ्रष्ट कर संसार में सुवृष्टि प्रदान करता है।

कुम्भी वेद्या मा व्यधिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषित्का। (ऋग्वेद)
अर्थात्, हे कुम्भ-पर्व तुम यज्ञीय वेदी में यज्ञीय आयुधों से घृत द्वारा तृप्त होने के कारण कष्टानुभव मत करो।

युवं नदा स्तुवते पज्रियाय कक्षीवते अरदतं पुरंधिम्।
करोतराच्छफादश्वस्य वृष्णः शतं कुम्भां असिंचतसुरायाः।। (ऋग्वेद)

कुम्भो वनिष्ठुर्जनिता शचीभिर्यस्मिन्नग्रे योग्यांगमर्भो अन्तः।
प्लाशिव्र्यक्तः शतधारउत्सो दुहे न कुम्भी स्वधं पितृभ्यः।। (शुक्ल यजुर्वेद)

10 चमत्कारी नमस्कार मंत्र,जो करेंगे आप की धन दोलत मे वृद्धि

कुम्भ-पर्व सत्कर्म के द्वारा मनुष्य को इस लोक में शारीरिक सुख देने वाला और जन्मान्तरों में उत्कृष्ट सुखों को देने वाला है।

आविशन्कलशूं सुतो विश्वा अर्षन्नाभिश्रिचः इन्दूरिन्द्रायधीयतो। (सामवेद)
पूर्ण कुम्भोडधि काल आहितस्तं वै पश्चामो बहुधानु सन्तः।

स इमा विश्वा भुवनानिप्रत्यकालं तमाहूः परमे व्योमन। (अथर्ववेद)

हे सन्तगण! पूर्णकुम्भ बारह वर्ष के बाद आया करता है, जिसे हम अनेक बार प्रयागादि तीर्थों में देखा करते हैं। कुम्भ उस समय को कहते हैं जो महान् आकाश में ग्रह-राशि आदि के योग से होता है।

चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि। (अथर्ववेद)

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ब्रह्मा कहते हैं-हे मनुष्यों! मैं तुम्हें ऐहिक तथा आयुष्मिक सुखों को देने वाले चार कुम्भ पर्वों का निर्माण कर चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में प्रदान करता हूं।
कुम्भीका दूषीकाः पीचकान्। (अथर्ववेद)
वस्तुतः वेदों में वर्णित महाकुम्भ की यह सनातनता ही हमारी संस्कृति से जुड़ा अमृत महापर्व है जो आकाश में ग्रह-राशि आदि के संयोग से ……………………….. की अवधि में उज्जैन में शिप्रा के किनारे मनाया जा रहा है।

माधवे धवले पक्षे सिंह जीवत्वेजे खौ।
तुलाराशि निशानाथे स्वातिभे पूर्णिमा तिथौ।
व्यतीपाते तु सम्प्राप्ते चन्द्रवासर-संचुते।
कुशस्थली-महाक्षेत्रे स्नाने मोक्षमवाच्युयात्।

अर्थात् जब वैशाख मास हो, शुक्ल पक्ष हो और बृहस्पति सिंह राशि पर, सूर्य मेष राशि पर तथा चन्द्रमा तुला राशि पर हो, साथ ही स्वाति नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि व्यतीपात योग और सोमवार का दिन हो तो उज्जैन में शिप्रा स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। विष्णु पुराण में कुम्भ के महात्म्य के संबंध में लिखा है कि कार्तिक मास के एक सहस्र स्नानों का, माघ के सौ स्नानों का अथवा वैशाख मास के एक करोड़ नर्मदा स्नानों का जो फल प्राप्त होता है, वही फल कुम्भ पर्व के एक स्नान से प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार एक सहस्र अश्वमेघ यज्ञों का फल या सौ वाजपेय यज्ञोें का फल अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी की एक लाख परिक्रमाएं करने का जो फल होता है, वही फल कुम्भ के केवल एक स्नान का होता है।

Copyright by – simhasthujjain

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